रुपया फिर फिसला! डॉलर के मुकाबले 95.44 पर बंद, कच्चे तेल और पश्चिम एशिया तनाव से बढ़ा दबाव

डॉलर के मुकाबले 95.44 रुपये पर भारतीय मुद्रा

रुपया फिर फिसला, डॉलर के मुकाबले 95.44 पर बंद: कच्चे तेल की महंगाई और पश्चिम एशिया का तनाव बढ़ा रहा दबाव

नई दिल्ली। भारतीय मुद्रा रुपये पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। गुरुवार को रुपया लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में कमजोर हुआ और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.44 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ। Reuters के मुताबिक यह जुलाई के मध्य के बाद रुपये की सबसे बड़ी एकदिनी गिरावट है।

कच्चे तेल की कीमतों ने बढ़ाई चिंता

रुपये की कमजोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और तेल आपूर्ति को लेकर बनी आशंकाओं के कारण ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है। गुरुवार को ब्रेंट करीब 102 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।

इस सप्ताह कच्चे तेल की कीमतों में 6 प्रतिशत से ज्यादा की तेजी ने भारत जैसी तेल आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए चिंता बढ़ा दी है। महंगा तेल भारत का आयात बिल बढ़ाता है और इससे डॉलर की मांग बढ़ने के साथ रुपये पर दबाव पड़ सकता है।

पश्चिम एशिया का तनाव बना बड़ा फैक्टर

अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष तथा खाड़ी क्षेत्र में जहाजों पर बढ़ते हमलों ने वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ाई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी की आशंका बनी हुई है।

बाजार में इस समय निवेशकों की नजर सिर्फ तेल की कीमतों पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम और अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों पर भी है।

RBI भी कर रहा रुपये को संभालने की कोशिश

रुपये में लगातार कमजोरी के बीच भारतीय रिजर्व बैंक भी बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। Reuters के अनुसार सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिक्री की गई, जबकि RBI ने लगातार दूसरे दिन डॉलर-रुपया sell-buy swap भी किया। इसका उद्देश्य रुपये की तरलता को नियंत्रित करने और मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने में मदद करना है।

हालांकि बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक RBI के कदम रुपये की गिरावट को कुछ हद तक सीमित कर सकते हैं, लेकिन यदि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है तो रुपये पर दबाव पूरी तरह खत्म होना मुश्किल हो सकता है।

आम लोगों पर क्या पड़ सकता है असर?

रुपये की कमजोरी और महंगे कच्चे तेल का असर आगे चलकर अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों पर दिखाई दे सकता है। महंगे तेल से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है और इससे मुद्रास्फीति पर भी दबाव बनने की आशंका रहती है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि रुपये में गिरावट के साथ ही पेट्रोल-डीजल की कीमतें तुरंत बढ़ जाएंगी। घरेलू ईंधन कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय क्रूड, रुपये की विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत, टैक्स और अन्य कारकों का असर पड़ता है। 10 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट 100 डॉलर के ऊपर रहने के बावजूद प्रमुख भारतीय शहरों में घरेलू ईंधन कीमतों में तत्काल बड़ा बदलाव नहीं हुआ।

अब बाजार की नजर इन संकेतों पर

आने वाले दिनों में रुपये की दिशा मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमत, पश्चिम एशिया का तनाव, डॉलर की मांग, विदेशी निवेश और RBI के कदमों से प्रभावित हो सकती है।

अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो रुपये पर दबाव कायम रह सकता है। वहीं पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने पर भारतीय मुद्रा को राहत मिल सकती है।

फिलहाल 95.44 रुपये प्रति डॉलर का स्तर भारतीय मुद्रा के लिए एक महत्वपूर्ण दबाव वाले दौर को दिखा रहा है।

डॉलर के मुकाबले 95.44 रुपये पर भारतीय मुद्रा
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच रुपये पर दबाव

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