द्रोणागिरी गांव में क्यों नहीं होती हनुमान जी की पूजा? न मंदिर, न लाल झंडा, जानिए संजीवनी पर्वत का रहस्य

द्रोणागिरी गांव और संजीवनी पर्वत से जुड़ी हनुमान जी की प्राचीन लोककथा

हनुमान जी से नाराज़ है यह पूरा गांव! न मंदिर, न पूजा, न लाल झंडा… आखिर क्या है 5000 साल पुराना रहस्य?

 

उत्तराखंड

द्रोणागिरी गांव और संजीवनी पर्वत से जुड़ी हनुमान जी की प्राचीन लोककथा
द्रोणागिरी गांव की अनोखी परंपरा—जहां हनुमान जी की पूजा नहीं की जाती

के हिमालय की ऊंची वादियों में बसा एक ऐसा गांव, जहां हनुमान जी का नाम लेना भी पसंद नहीं किया जाता। न कोई हनुमान मंदिर, न लाल झंडा, न पूजा-अर्चना। आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस बजरंगबली की पूजा पूरे भारत में होती है, उसी हनुमान जी से यह गांव सदियों से नाराज़ है?

 

यह रहस्यमयी गांव है द्रोणागिरी, जो उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह वही स्थान माना जाता है जहां से रामायण काल में हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने पहुंचे थे।

 

जब लक्ष्मण के प्राण बचाने निकले थे हनुमान

 

रामायण के अनुसार लंका युद्ध में मेघनाद के बाण से लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे। वैद्य सुषेण ने उन्हें बचाने के लिए हिमालय से संजीवनी बूटी लाने का सुझाव दिया। तब भगवान राम के आदेश पर हनुमान जी हिमालय पहुंचे।

 

लेकिन समस्या यह थी कि हनुमान जी संजीवनी बूटी को पहचान नहीं पाए। समय बहुत कम था और लक्ष्मण के प्राण संकट में थे। ऐसे में उन्होंने पूरा पर्वत ही उठा लिया और लंका की ओर उड़ गए।

 

यहीं से शुरू हुई नाराज़गी!

 

द्रोणागिरी गांव के लोगों का मानना है कि हनुमान जी जिस पर्वत का हिस्सा उठाकर ले गए, वह उनका पवित्र द्रोणागिरी पर्वत था। ग्रामीणों का विश्वास है कि यह पर्वत उनके आराध्य देवता का स्वरूप था और हनुमान जी ने बिना अनुमति उसके एक हिस्से को उखाड़ लिया।

 

इसी घटना के बाद गांव के लोगों में हनुमान जी के प्रति नाराज़गी पैदा हुई, जो आज तक चली आ रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि उनकी आस्था और पहचान का प्रतीक था।

 

न मंदिर, न मूर्ति, न लाल झंडा

 

द्रोणागिरी गांव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां आपको हनुमान जी का एक भी मंदिर नहीं मिलेगा। गांव में लाल झंडा लगाने की भी परंपरा नहीं है। कई स्थानीय परिवार आज भी हनुमान जी की पूजा नहीं करते और अपनी परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी निभाते आ रहे हैं।

 

राम की पूजा होती है, लेकिन हनुमान की नहीं

 

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि गांव के लोग भगवान राम को मानते हैं, रामनवमी भी मनाते हैं, लेकिन हनुमान जी की पूजा से दूरी बनाए रखते हैं। यह परंपरा भारत की सबसे अनोखी धार्मिक मान्यताओं में से एक मानी जाती है।

 

रामलीला पर भी रहा विवाद

 

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जब-जब गांव में रामलीला आयोजित करने की कोशिश हुई, तब-तब किसी न किसी अनहोनी की चर्चा हुई। इसी कारण वर्षों से यहां रामलीला का आयोजन भी नहीं किया जाता।

 

रहस्य आज भी बरकरार

 

द्रोणागिरी पर्वत आज भी देश-विदेश के शोधकर्ताओं, पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। कई लोग इसे संजीवनी बूटी का क्षेत्र मानते हैं, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है।

 

आस्था बनाम इतिहास

 

इतिहासकार इसे स्थानीय लोककथा और धार्मिक मान्यता मानते हैं, जबकि गांव के लोग इसे अपनी सांस्कृतिक विरासत और आस्था का हिस्सा बताते हैं। सच चाहे जो भी हो, द्रोणागिरी गांव की यह कहानी भारत की सबसे रहस्यमयी और अनोखी धार्मिक परंपराओं में से एक है।

 

निष्कर्ष

 

जहां पूरे देश में हनुमान जी को संकटमोचन और कलयुग के देवता के रूप में पूजा जाता है, वहीं उत्तराखंड का द्रोणागिरी गांव आज भी अपनी सदियों पुरानी मान्यता पर कायम है। यही वजह है कि यह गांव आज सोशल मीडिया, यूट्यूब और धार्मिक चर्चाओं में लगातार सुर्खियां बटोर रहा है।

 

क्या आप मानते हैं कि यह सिर्फ एक लोककथा है या फिर इसके पीछे कोई गहरा रहस्य छिपा है? अपनी राय जरूर बताइए।

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